Friday, December 25, 2009

शाम है..........

शाम है, तन्हाई को गले लगाना है,
जाने मेरे घर में अभी, किस किस को आना है,

क्या मुसीबत है जान हम दोनों के लिए,
बिन मिले एक दूसरे से मिलके आना है,

उम्र सारी तेरी चाहत के नाम कर देते,
मगर कुछ लम्हें तो अपने लिए बचाना है,

राह काँटों भरी मेरी है लेकिन,
इस राह से ही आपको भी घर जाना है,

Sunday, December 20, 2009

मुझमे कुछ.................

मुझमे कुछ मर गया है शायद,
वो अपना काम कर गया है शायद,

गर्द-ओ-गुबार बैठने लगे है फिर,
वक़्त हँस के गुजर गया है शायद,

चले तो दोनों साथ ही थे,
वो किसी मरहले पर ठहर गया है शायद,

आज ख़त कोरा ही वापस आया,
खौफ-ए-रुसवाई से डर गया है शायद,

सुना है उसने फिर किया है याद मुझको,
एक और "दिल" से जी भर गया है शायद,

Sunday, November 8, 2009

फिर नाकामी...........

तेरी गलियों से फिर नाकाम लौटा,
जैसे बिन मिले जरुरी पैगाम लौटा,

तेरी दीद को तरसती आबशार लेकर,
फिर तेरे दर से बदनाम लौटा,

कोई पूछने वाला न दिख सका मुझको,
की तुमको दिल में लिए गुमनाम लौटा,

सुबह से ही खाक छानी तेरी यादों की,
घर से निकला तो शर - ऐ-शाम लौटा,

कई दिन हुए खुदा को याद किए हुए,
जब याद आई तो मेरा अजान लौटा,

तेरे शहर से कुछ लेकर लौटा हूँ.........

तेरे शहर से कुछ लेकर लौटा हूँ,

कुछ पुरानी यादें, अधूरे वादे,
कुछ उलझे सवाल, तेरा ख्याल,

तूझे कभी न पाने की कसक,
तेरे हाँथों की नई मेहँदी की महक,

कुछ जगहों पे तेरे कदमो का अहसास,
मेरे लबो पे तेरे होंटों की मिठास,

मेरे दिल की तरह टूटा, अँगूठी का टुकड़ा,
लाखो गम छुपाये तेरा मुस्कुराता मुखड़ा,

दूर से हाथ हिलाता तेरा धुँधला सा अक्स,
बेपलक ताकता मेरे भीतर का वो शख्स,

सबकुछ हाँ सभी ले आया हूँ,
जानती हो इस दफा खाली हाँथ नहीं लौटा,

















Friday, October 9, 2009

खलिश...

एक उम्र बसर सर-ए- राह की हमने,
तेरे बगैर यूँ भी निबाह की हमने,

वो हँस रहे हैं देख कर धार-ए-नश्तर,
भेज लानत की अगर एक आह की हमने,

उसी समय से आवारगी की बाम चढ़े,
कि जिस दिन से तेरी चाह की हमने,

कोई साथी नही मेरे शब्-ए-तन्हाई का,
कि आंसुओं से तेरे बाद निकाह कि हमने,

Saturday, October 3, 2009

कुछ ऐसे ही....

कभी तेरे बात की खुशी,
कभी तेरे साथ की खुशी,

अब तू खुश है कहीं.......मुझे इस बात की खुशी,

Friday, October 2, 2009

नाकाम कोशिश........



देख ली सारी कोशिशे करके,
कोई तो तौर बता,तुझको भूल जाने का,

थोड़ा खून बेचते है,थोड़ी खुशी,
ये मेरा सलीका,ज़िन्दगी बिताने का,

तेरी याद,तेरी जुस्तजू, तेरी तमन्ना,
ये लाल-ओ-गुहार मेरे खजाने का,

मिट चुके होते शायद कभी के,
अगर न होता इंतज़ार तेरे आने का,

लाल-ओ-गुहार -हीरा-मोती

Saturday, September 26, 2009

सवाल..............





मेरी चाह मे तो कमी रही,
तेरी आँख मैं क्योँ नमी रही,

ता उम्र मैं रहा बदनाम तेरे नाम से,
तेरी खलुष मे फिर क्यूँ कमी रही,

तेरे तशव्वूर मे मेरा ख्याल भी नही,
तेरी याद मेरी जीस्त की दायामी रही,

तुमसे गले लगे सद्दियाँ गुजर गई,
तेरी जुल्फ मे आज कैसी बरहमी रही,

तुम्हारी ज़िन्दगी मे बहुत मुमकिन है खुशियाँ हो,
हमारी ज़िन्दगी मे खैर वही मातमी रही,







खलुष- खुशी

जीस्त- ज़िन्दगी,

बरहमी- उलझा हुआ






Sunday, September 20, 2009

एहसास...





जगह वो अब भी है मेरे जेहन में,
जहा गुजरे थे वक्त तेरे प्यार में,

परी चेहरा जो कभी था हमारा,
अब वो भी नही हमारे इख्तियार में,

जहाँ से मुड गई थी अपनी राहें,
वहीँ खड़ा मैं तेरे इंतज़ार में,

ना तू, ना वक्त,ना दुनिया, ना मिजाज,
बचा कुछ भी नही मेरे आबशार में,

बहुत भटका हूँ,जुस्तजू में तेरी,
निशाँ पाँव के मिलेंगे कू -ए- यार में,


आबशार- आँख
जुस्तजू- तलाश





Wednesday, September 16, 2009

तलाश.....




मैं तुम्हे भूलने की कोशिश मैं,

ख़ुद को तेरे मुतसिल पाता हूँ,


जो कभी रहा नही हमारे दर्मयाँ,

मैं वही निश्बते निभाता हूँ,


जहाँ बीते थे अपनी कुर्बतों के पल,

जगह वो बार बार जाता हूँ,


अब भी रातों को तन्हाई मैं,

तेरी याद से अपनी पलके भिगाता हूँ,

मुतसिल - बहुत करीब

निस्बते- रिश्ता

Tuesday, September 15, 2009

मेरी चाह......




तुम मुझे आधार दो अब,

अव्यवस्तिथ, निराकार मैं,

तुम मुझे आकार दो अब,


जिंदगी मेरी कुरूप,

तुम इसे संवार दो अब,


पाने का तुम्हे है स्वप्न,

तुम इसे साकार दो अब,


मैं भटकता नफरतों मैं,

तुम मुझे प्यार दो अब,


आकर लग जाओ सीने से,

ऐसा कोई उपहार दो अब,





Sunday, September 13, 2009

दर्द....





जो गलती की नही मैंने, वो मुझको क्यूँ सुनाते हैं,


सारी बात का दोषी मुझे ही क्यूँ बताते हैं,


जो उनकी बात सुनता हूँ, तो आंखों पर बिठाते है,


जो अपनी बात कहता हूँ, तो आंखों से गिराते हैं,


जो पट्टी बाँध लेता हूँ, तो सब रास्ता दिखाते हैं,


मगर जब खोल लेता हूँ, तो अपनी रह जाते हैं,


मुझे क्या हो गया है बस यही चिंता जताते है,


समझता नही है मुझे कोई,बस सब समझाते है,


मैं जब भी साथ होता हूँ, मुझे अपना बताते हैं,


मगर जब भी हुआ तनहा अकेला छोड़ जाते है,





बेखुदी......





मैं तुम्हारे साथ एक नामालूम सफर पर हूँ,

लब खामोश और सब खामोश हैं,


मगर बोल रही हमारी निगाहें,

जिसने आज तक कुर्बत नही देखी,


तुम मेरी बाँहों मैं सिमट रही हो,

मेरी रूह तुममे पिघल रही है,


की तभी एक आहट सी होती है,

और तुम चौंक जाती हो,


की अचानक याद आता है की,

हम तनहा नही है,


सही है अक्सर होश ही ,

तन्हाई लाती है....................हम बेहोश ही कितने अच्छे थे जान










मेरी तुम.....


कंपकपाता मैं पथिक,
और तुम अलाव हो मेरा,

चिलचिलाती धुप सर पे,
और तुम छाँव हो मेरा,

मैं शहर की कशमकश,
और तुम गाँव हो मेरा,

जीवन मेरी एक अल्हड नदी,
और तुम नाव हो मेरा,

जाने कबसे चल रहा,
अब तुम पडाव हो मेरा,
मैं तो था ठहरा सा पानी
और तुम हो बहाव मेरा.

ये रिश्ता......




तुम कौन हो मैं नही जानता,


तुम कहाँ से आए कहाँ मालूम,




हाँ मगर कुछ बात हैं तुममे


की जब भी साँस लेता हूँ


तुम्हे महसूस करता हूँ,


की हर लम्हे मैं तुम्हे ही देखता हूँ,


की हर पल मैं तुम्हे ही मांगता हूँ,




एक अनकहा रिश्ता है तुमसे मेरा,


जिसे एक नाम देना है मुझे,


जो दुनिया की समझ से परे है,


मगर तुम जानते हो हमारे रिश्ते का नाम,


नही वो तो दुनिया से ही परे है.................................