मुझमे कुछ मर गया है शायद,
वो अपना काम कर गया है शायद,
गर्द-ओ-गुबार बैठने लगे है फिर,
वक़्त हँस के गुजर गया है शायद,
चले तो दोनों साथ ही थे,
वो किसी मरहले पर ठहर गया है शायद,
आज ख़त कोरा ही वापस आया,
खौफ-ए-रुसवाई से डर गया है शायद,
सुना है उसने फिर किया है याद मुझको,
एक और "दिल" से जी भर गया है शायद,
Sunday, December 20, 2009
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bahut khoob.
ReplyDeletebhawnaon ko vistar diya hai apne .
likhte rahen