तेरी गलियों से फिर नाकाम लौटा,
जैसे बिन मिले जरुरी पैगाम लौटा,
तेरी दीद को तरसती आबशार लेकर,
फिर तेरे दर से बदनाम लौटा,
कोई पूछने वाला न दिख सका मुझको,
की तुमको दिल में लिए गुमनाम लौटा,
सुबह से ही खाक छानी तेरी यादों की,
घर से निकला तो शर - ऐ-शाम लौटा,
कई दिन हुए खुदा को याद किए हुए,
जब याद आई तो मेरा अजान लौटा,
Sunday, November 8, 2009
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चाहतें ऐसे ही दिन दिखाती हैं .
ReplyDeleteexcellent
ReplyDeleteBahut hi khubsurat panktya.................dil ko choo gai.
ReplyDeleteहिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
ReplyDeleteकृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढ़े और टिप्पणी करें
बस ठीक ही है झूठी तारीफ नहीं करना चाहता माफ करियेगा
ReplyDeletevery good brother...
ReplyDeletenarayan narayan
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