Wednesday, September 16, 2009

तलाश.....




मैं तुम्हे भूलने की कोशिश मैं,

ख़ुद को तेरे मुतसिल पाता हूँ,


जो कभी रहा नही हमारे दर्मयाँ,

मैं वही निश्बते निभाता हूँ,


जहाँ बीते थे अपनी कुर्बतों के पल,

जगह वो बार बार जाता हूँ,


अब भी रातों को तन्हाई मैं,

तेरी याद से अपनी पलके भिगाता हूँ,

मुतसिल - बहुत करीब

निस्बते- रिश्ता

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