Sunday, September 13, 2009

मेरी तुम.....


कंपकपाता मैं पथिक,
और तुम अलाव हो मेरा,

चिलचिलाती धुप सर पे,
और तुम छाँव हो मेरा,

मैं शहर की कशमकश,
और तुम गाँव हो मेरा,

जीवन मेरी एक अल्हड नदी,
और तुम नाव हो मेरा,

जाने कबसे चल रहा,
अब तुम पडाव हो मेरा,
मैं तो था ठहरा सा पानी
और तुम हो बहाव मेरा.

5 comments:

  1. umda rachna likhte rehne .
    yeh jivit rehne ki anubhuti hai.......

    satya .

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  2. one of the best pem... keep up writing :))

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  3. subtle, but very expressive. well written.

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  4. ye bhi abhisapt swapn se inspired hai..........

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