Friday, October 9, 2009

खलिश...

एक उम्र बसर सर-ए- राह की हमने,
तेरे बगैर यूँ भी निबाह की हमने,

वो हँस रहे हैं देख कर धार-ए-नश्तर,
भेज लानत की अगर एक आह की हमने,

उसी समय से आवारगी की बाम चढ़े,
कि जिस दिन से तेरी चाह की हमने,

कोई साथी नही मेरे शब्-ए-तन्हाई का,
कि आंसुओं से तेरे बाद निकाह कि हमने,

3 comments:

  1. bahut achha . magar maine to suna hai ki ghazal kam az kam 5 sheron ki hoti hai.

    khair naya zamana hai.

    keep t up

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  2. बहुत खूब .....!!

    आपकी कुछ एक नज्में पढ़ी मैंने ....आपमें प्रतिभा है ...बहुत ही उम्दा सोच है आपकी ....प्रोफाइल में आपका नाम पता नहीं है अपने नाम से लिखें ....मुझे उम्मीद है जल्द ही ब्लॉग जगत में आप अपना स्थान बना लेगें ....!!

    haan word verification hta lein ...!!

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  3. really heart touching poetries.
    isse jyada..kya kahu...
    u take care.
    shilpi

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