Friday, October 22, 2010

तुम बहुत याद आती हो,

जब सपने भी जल जाते है,
और अपने भी छल जाते है,
सच तुम बहुत याद आती हो,

जब खुद पे ही चिल्लाता हूँ,
कुछ लिखने से घबराता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,

जब हालात से खौफ खाता हूँ,
एक कदम बढने से घबराता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,

जब कभी सफलता पाता हूँ,
और कभी कभी मुस्काता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,


जब रात को तन्हा होता हूँ,
यादों से घिर कर रोता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,






4 comments:

  1. बहुत शिद्दत से याद किया. खूबसूरत पंक्तियां। आभार।

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  2. जीवन के
    सबसे सुन्दरतम दिनों में
    तुम्हारा साथ
    खिलते गुलाब पर
    कविता करने जितना सुखद था
    तब
    तुम्हारे करीब होने का
    अहसास
    आँगन में पसरी
    जाड़े की गुनगुनाती धूप की तरह
    आरामदायक थी
    और
    सन्दर्भ के
    किसी भी छोड़ पर बैठ
    मीलों आ ठिठकती
    तुम्हारी
    बात से जोड़ती बात
    सुबह की चाय पर चाय
    की तरह प्यारी थी
    तभी तो
    अधिकारपूर्वक
    तुम्हारा सौंपा हर विश्वास
    मेरे उन दिनों में
    मुफलिसी की नवाबी थी

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  3. आपकी कविता ने मुझे भी उनदिनों की याद दिला दी

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  4. इतने दिनों के बाद आपके दर्शन हुए..
    बहुत ही ख़ूबसूरत रचना के साथ आप वापस आएँ...

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