जब सपने भी जल जाते है,
और अपने भी छल जाते है,
सच तुम बहुत याद आती हो,
जब खुद पे ही चिल्लाता हूँ,
कुछ लिखने से घबराता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,
जब हालात से खौफ खाता हूँ,
एक कदम बढने से घबराता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,
जब कभी सफलता पाता हूँ,
और कभी कभी मुस्काता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,
जब रात को तन्हा होता हूँ,
यादों से घिर कर रोता हूँ,
सच तुम बहुत याद आती हो,
Friday, October 22, 2010
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बहुत शिद्दत से याद किया. खूबसूरत पंक्तियां। आभार।
ReplyDeleteजीवन के
ReplyDeleteसबसे सुन्दरतम दिनों में
तुम्हारा साथ
खिलते गुलाब पर
कविता करने जितना सुखद था
तब
तुम्हारे करीब होने का
अहसास
आँगन में पसरी
जाड़े की गुनगुनाती धूप की तरह
आरामदायक थी
और
सन्दर्भ के
किसी भी छोड़ पर बैठ
मीलों आ ठिठकती
तुम्हारी
बात से जोड़ती बात
सुबह की चाय पर चाय
की तरह प्यारी थी
तभी तो
अधिकारपूर्वक
तुम्हारा सौंपा हर विश्वास
मेरे उन दिनों में
मुफलिसी की नवाबी थी
आपकी कविता ने मुझे भी उनदिनों की याद दिला दी
ReplyDeleteइतने दिनों के बाद आपके दर्शन हुए..
ReplyDeleteबहुत ही ख़ूबसूरत रचना के साथ आप वापस आएँ...