Tuesday, April 27, 2010

एक रुकी हुई रात...

घंटो शायद पहरों,
एक रुकी हुई रात,
हर रोज  आती है,
हर रोज एक ही बात्तें,
एक जैसी चीजे हर रोज,
ऑफिस, ऑटो, फ़ोन,मैं,
सड़क की चीजे,जाने क्या-क्या,

 एक ही तरह के सवाल,
और उनका एक ही जवाब,
कुछ नयापन तलाशने की,
न कोई आस न कभी प्रयास,
अनगिनत पल एक जैसे ही,

और इन पलो में बीतता मैं,
हर लम्हा तुम्हारी याद के साथ,
आज भी तुम्हारे इंतज़ार में,
इसी रुकी हुई रात की तरह,
ठहरा हुआ, वहीँ पड़ा हुआ,

मैं तुम्हारे इंतजार में.....

3 comments:

  1. BAHUT HI ACHHI RACHNA...
    PADHKAR ACHHA LAGA...
    YUN HI LIKHTE RAHEIN....

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  2. -------------------------------------
    mere blog par is baar
    तुम कहाँ हो ? ? ?
    jaroor aayein...
    tippani ka intzaar rahega...
    http://i555.blogspot.com/

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