तेरे मेरे बीच की चाहत,
एक हकीकत थी या कोई ख्वाब,
ये रिश्ता भी खुदा -शाज था,
या फिर बनाया था हमने सोचकर,
जिस राह पे तेरा हाथ थामे,
मैं चला था सबकुछ छोड़कर,
उसकी कोई मंजिल थी,
या फिर यूँ ही समय की बर्बादी,
तुमसे मिली जो कोमल खुशियाँ,
उसपर करू विश्वास या न करू कोई आस,
जो खवाब तेरे साथ देखे,
क्या कभी पुरे होंगे या टूटेंगे हमेशा की तरह,
क्या समझू मैं............
Friday, January 8, 2010
Saturday, January 2, 2010
एक सच....
भला कहाँ तक उसे मेरे साथ चलना था,
की एक दिन तो उसे रास्ता बदलना था,
मेरे पैरो को तो यायावरी का श्राप मिला,
और उसके भाग्य में किसी मोड़ पे ठहरना था,
मैं भी कहाँ अटल रहा अपनी बात पर,
सो उसको भी तो अपनी बात से मुकरना था,
एक तेरे नाम पर अनेक स्वर मुखर हुए,
इतना तो मेरी बात में पहले असर न था,
अब लोग कहते है,ये है तेरा कर्मफल,
तेरे नसीब में इस हाल से गुजरना था,
की एक दिन तो उसे रास्ता बदलना था,
मेरे पैरो को तो यायावरी का श्राप मिला,
और उसके भाग्य में किसी मोड़ पे ठहरना था,
मैं भी कहाँ अटल रहा अपनी बात पर,
सो उसको भी तो अपनी बात से मुकरना था,
एक तेरे नाम पर अनेक स्वर मुखर हुए,
इतना तो मेरी बात में पहले असर न था,
अब लोग कहते है,ये है तेरा कर्मफल,
तेरे नसीब में इस हाल से गुजरना था,
Subscribe to:
Comments (Atom)